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आदिवासियों ने मनाया धूमधाम से सरहुल पर्व, बरकाकाना नयानगर में केंद्रीय सरहुल मिलन समारोह में ढोल नगाड़ों एवं मांदर के साथ शामिल हुए हजारों महिला पुरुष

संवाददाता अशोक मुंडा

01/04/2025

रामगढ़ झारखंड 

झारखंड के रामगढ़ जिला अंतर्गत बरकाकाना नयानगर में केंद्रीय सरहुल मिलन समारोह का आयोजन किया गया जहां धूमधाम से प्रकृति पर्व सरहुल मनाया गया,

सरहुल मिलन समारोह में मुख्यअतिथि के रूप में शामिल बड़कागांव विधानसभा के विधायक रोशन लाल चौधरी, विशिष्ट अतिथि जिला पूर्व परिषद उपाध्यक्ष मनोज राम.झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय सचिव संजीव बेदिया,विश्व सूत्री उपाध्यक्ष दिनेश मुंडा, छोटेलाल करमाली, वार्ड पार्सद विनोद तिवारी, डॉ मनोज अगरिया,देवकीनंदन बेदिया, प्रदीप करमाली स्टेशन मास्टर, भारत कुमार विश्वकर्मा नेपाल विश्वकर्मा कृष्णा प्रताप मीणा, विक्रम सिंह मीणा, मंगलेश्वर उरांव,लालू उराव, सोहेल अंसारी, बीमलाल मुंडा, मनीराम मुंडा, शिवनारायण बेदिया शामिल थे 

केंद्रीय मिलन समारोह के आयोजन कर्ता अध्यक्ष गोविंद बेदिया, सचिन पंचदेव करमाली कोषाध्यक्ष प्रदीप बेड़िया उपाध्यक्ष शिवनारायण बेदिया सहसचिव तूफान उरांव कोषाध्यक्ष मुकेश मुंडा उपाध्यक्ष रविंद्र मुंडा सह सचिव दिलीप उरांव सह सचिव जितेंद्र मुंडा उपाध्यक्ष महेश मुंडा सह सचिव राजू बेदिया सहसचिव दिनेश करमाली सह सचिव किसान मुंडा सह सचिव सूरज बरला अंकित उरांव द्वारा सरहुल मिलन समारोह कार्यक्रम को सफल बनाया गया,

 झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय सचिव संजीव बेदिया ने कहा कि चैत माह के शुक्ल पक्ष के द्वितीय एवं तृतीय प्रकृति पर्व सरहुल मनाया जाता है, कहा जाता है,कि आदिकाल से आदिवासी समाज अपने खेतों में फसल लगाने के पूर्व साल के वृक्ष के नीचे आदिवासी समाज के द्वारा इस दिन गांव के पाहन के द्वारा केकड़ा पकड़ने का दिन और रूसा होता है,जिसमें गांव वालों को खेती बाड़ी से संबंधित कोई भी काम नहीं करने दिया जाता है, और दूसरे दिन सरना स्थल में घड़े में पानी रखकर विधि विधान से मुर्गे की बाली देकर पूजा पाठ करते हैं,और यह अनुमान लगाते हैं,कि वर्षा कितना अच्छा होगा, उसके बाद अपने खेतों में फसल लगाने एवं फसल की अच्छी पैदावार कैसा रहेगा यह पाहन के द्वारा ही बताया जाता रहा है, और पहन के द्वारा ही पूरे गांव के लोगों के लिए प्रकृति एवं सरना के देवता से सबों की सुखी और समृद्धि की कामना की जाती है, साथ ही साथ गांव के महिला पुरुष इसकी खुशी में सरना स्थल पहुंचकर ढोल नगाड़ों के साथ नाचते गाते हैं,और खुशियां मनाते हैं,

वर्तमान समय में झारखंड, बंगाल उड़ीसा असम छत्तीसगढ़ राजस्थान जैसे राज्यों में आदिवासी समाज अलग-अलग तरीके से त्योहार को मानते हैं, लेकिन झारखंड जैसे आदिवासी बहुल राज्य में इस पर्व को काफी धूमधाम से मनाया जाता है खासकर पतझड़ के मौसम में जब शाल, आम एवं महुआ के पेड़ों से पत्ते झड़ जाते हैं और नए-नए पत्ते फल फूल आते हैं उसके बाद जब तक आदिवासी समाज प्रकृति पर्व सरहुल नहीं बनता है,तब तक नए फल फूल का सेवन नहीं करता है,ऐसा परंपरा आदिवासी समाज में है,

वर्तमान समय में विकास के नाम पर आदिवासी इलाकों में जिस तरह से जंगलों की अंधाधुंध कटाई हो रही है और कल कारखाने लगाए जा रहे हैं इससे जंगलों में रहने वाले जीव जंतु एवं जंगलों से मिलने वाले विभिन्न तरह के जड़ी बूटी और वन उपज धीरे-धीरे समाप्त होते जा रहा है, इसलिए आदिवासी समाज आज लगातार अपने धरोहर और जल जंगल जमीन बचाने और संस्कृति बचाने को लेकर सरहुल महोत्सव का आयोजन करते हैं,


 प्रकृति पर्व सरहुल को हर्षोल्लास के साथ रामगढ़ जिला के पतरातू भुरकुंडा, बरकाकाना, अरगड्डा सिरका एवं मांडू के बुमरी पंचायत के सरना स्थल में पंचायत के मुखिया करण बेदिया  पंचायत समिति लालचंद बेड़िया एवं गांव के महिला पुरुषों ने मनाया गया,

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